सोमवार, 9 सितंबर 2019

कविता, मुजरालय

    नमस्कार, आज मै आपके सम्मुख जो कविता रखने जा रहा हूँ उस कविता का शीर्षक मेरे विचार से हिन्दी एवं उर्दू दोनों ही भाषाओ में एक नया शब्द है, इस शब्द को बनाने के लिए मैने उर्दू भाषा के शब्द 'मुजरा' जिसका अर्थ होता है कामुक नाच और हिन्दी भाषा के शब्द 'आलय' जिसका अर्थ होता है भवन को मिलाकर बनाया है वो शब्द है 'मुजरालय' | मैं इस कविता कि भूमिका में बस इतना ही कहना चाहूंगा के आज हमारे देश में देह व्यापार अपनी जड़े जमा चुका है और लगातार फल फुल रहा है, जबकि हमारे देश में देह व्यापार करना या कराना एक जघन्य अपराध है और इसमें दोषी पाए जाने पर कड़ी सजा का प्रावधान है लेकिन फिर भी देह व्यापार और वेश्यावृत्ति दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ रही है |

     देह व्यापार और वेश्यावृत्ति के इस दलदल में रोज हजारों मासुम बच्चीयों और महिलाओं को झोंक दिया जाता है और कुछ महिलाओं और बच्चीयों को यह अपराध अपना पेट पालने के लिए भी करना पड़ता है, आज परिस्थिति ये है कि हमारे देश भारत के हर बड़े छोटे शहर में एक गली ऐसी है जो देह व्यापार और वेश्यावृत्ति के लिए बदनाम है और ताज्जुब तो ये है कि हमारे देश की केन्द्र हो या राज्य की सरकारों ने सब कुछ जानते हुए भी अपने आख और कान मुद रखे हैं | मैने कुछ दिनों पहले कही पढा था की आज केवल हमारे देश में तकरीबन दो करोड से ज्यादा देह व्यापार एवं वेश्यावृत्ति में लिप्त महिलाए एवं पुरुष हैं और अब तो यह अमानवीय कारोबार भारत से विदेशों तक में होने लगा है |

      इसे आखिर कब तक हमारा सभ्य समाज देख कर भी अनदेखा करता रहेगा और पुलिस अमला एवं सरकारें मूक दर्शक बनकर केवल तमाशा देखती रहेंगी | क्या अब जब देश नयी तरक्की की राह पर आगे बढ रहा है तो इन्हें इनके विकास का मौका नही मिलना चाहिए ? , क्या ये लोग देश की सरकार को चुनने में अपना फर्ज अदा नही करते क्या ? इनके भले के लिए कुछ और बेहतर प्रयासों, जागरुकता और कानूनों की जरुरत है |

मुजरालय

पायल की छन छन
चूड़ियों की खन खन
तबले की थप थप
घुंघरूओ की छनन छनन
नृत्य और संगीत का रस
काम का सिंगार का रस
या यूं कि कहो मदिरालय
या कहो मुजरालय

आम बस्ती से अलग बसी
वो मशहूर वो बदनाम गलियां
जानता है हर शरीफ शख्स पर
फिर भी है वो गुमनाम गलियां
न बिजली न पानी न सड़कें
ना ही कोई विद्यालय न शिवालय
जहां आबाद है ये मुजरालय

जीने का हक तो है इन्हें
पर जिंदगी तो कही है नहीं
सूरज रोज निकलता है यहां
धूप भी आती है आंगन में
पर रोशनी तो कही है नहीं
ललचा रही है एक तितली
हवस के भूखे भवरों को
जिसे उड़ना चाहिए फूलों पर
वो आ पहुंची है मुजरालय

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      इस कविता को लिखते वक्त अगर शब्दो में या टाइपिंग में मुझसे कोई गलती हो गई हो तो उसके लिए मै बेहद माफी चाहूंगा | मै जल्दी ही एक नई रचना आपके सम्मुख प्रस्तुत करूंगा | तब तक अपना ख्याल रखें अपनों का ख्याल रखें , नमस्कार |

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