नमस्कार , एक सप्ताह की दिवाली कि छुट्टी पर हूं तो कोशिश कर रहा हूं कि अपनी जितनी रचनाएं अभी तक आप तक नही पहुंचापाया हूं उन्हें आपके सम्मुख प्रस्तुत करूं | इसी सिलसिले में पहली कविता आपको समर्पित कर रहा हूं |
बिछड़ने का गम जरा कम होता है
वो बन गई थी जिंदगी मेरी
मै था धड़कन उसकी
उनके मुंह मोड़ने के बाद से
खत्म ये भरम होता है
बिछड़ने का गम, जरा कम होता है
किसी के इंतजार में
किसी के बेसब्र प्यार में
फलक से दूर तन्हा
कोई दिवाना, सनम होता है
बिछड़ने का गम, जरा कम होता है
ऐ खुदा बता तू
जिसे मैं जा देता हूँ
अगर वो मुझे बेसहार कर दे तो
फिर क्यों कहते वो, पागल हरदम रोता है
बिछड़ने का गम, जरा कम होता है
जब जिंदगी साथ छोड़ जाती है
खामोशियां तन्हाइयाँं दिल को घर बनाती हैं
नैनों की निदे टकराती हैं
तब यादो का ही तो मरहम होता है
बिछड़ने का गम, जरा कम होता है |
वो बन गई थी जिंदगी मेरी
मै था धड़कन उसकी
उनके मुंह मोड़ने के बाद से
खत्म ये भरम होता है
बिछड़ने का गम, जरा कम होता है
किसी के इंतजार में
किसी के बेसब्र प्यार में
फलक से दूर तन्हा
कोई दिवाना, सनम होता है
बिछड़ने का गम, जरा कम होता है
ऐ खुदा बता तू
जिसे मैं जा देता हूँ
अगर वो मुझे बेसहार कर दे तो
फिर क्यों कहते वो, पागल हरदम रोता है
बिछड़ने का गम, जरा कम होता है
जब जिंदगी साथ छोड़ जाती है
खामोशियां तन्हाइयाँं दिल को घर बनाती हैं
नैनों की निदे टकराती हैं
तब यादो का ही तो मरहम होता है
बिछड़ने का गम, जरा कम होता है |
मेरी कविता के रूप में एक और छोटी सी यह कोशिस आपको कैसी लगी है मुझे अपने कमेंट के जरिए जरुर बताइएगा | अगर अपनी रचना को प्रदर्शित करने में मुझसे शब्दों में कोई त्रुटि हो गई हो तो तहे दिल से माफी चाहूंगा | एक नई रचना के साथ मैं जल्द ही आपसे रूबरू होऊंगा | तब तक के लिए अपना ख्याल रखें अपने चाहने वालों का ख्याल रखें | मेरी इस रचना को पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया | नमस्कार |
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