सोमवार, 9 सितंबर 2019

कविता, लहर के साथ सब बह कर आ गए

    नमस्कार , कुछ दो तीन महीने पहले लिखी एक छोटी सी कविता साझा कर रहा हूँ आपके आशीर्वाद की आशा है

लहर के साथ सब बह कर आगए

लहर के साथ सब बह कर आगए
उखड़े पुखडे पेड़ सारे
साथ होगए नदी के किनारे
छोटे-मोटे पत्थर से लेकर
कूड़ा करकट , टूटी फूटी नाव , पतवारें

लहर के साथ सब बह कर आगए
महापंचायत के दरवाजे तक
बहाकर आया सारा मलवा
अब यहीं पड़ा रहेगा , सड़ता रहेगा
पांच साल पूरा होने तक

      मेरी ये कविता अगर अपको पसंद आई है तो आप मेरे ब्लॉग को फॉलो करें और अब आप अपनी राय बीना अपना जीमेल या जीप्लप अकाउंट उपयोग किए भी बेनामी के रूप में कमेंट्र कर सकते हैं | आप मेरे ब्लॉग को ईमेल के द्वारा भी फॉलो कर सकते हैं |

      इस कविता को लिखते वक्त अगर शब्दो में या टाइपिंग में मुझसे कोई गलती हो गई हो तो उसके लिए मै बेहद माफी चाहूंगा | मै जल्दी ही एक नई रचना आपके सम्मुख प्रस्तुत करूंगा | तब तक अपना ख्याल रखें अपनों का ख्याल रखें , नमस्कार |

कविता, मुजरालय

    नमस्कार, आज मै आपके सम्मुख जो कविता रखने जा रहा हूँ उस कविता का शीर्षक मेरे विचार से हिन्दी एवं उर्दू दोनों ही भाषाओ में एक नया शब्द है, इस शब्द को बनाने के लिए मैने उर्दू भाषा के शब्द 'मुजरा' जिसका अर्थ होता है कामुक नाच और हिन्दी भाषा के शब्द 'आलय' जिसका अर्थ होता है भवन को मिलाकर बनाया है वो शब्द है 'मुजरालय' | मैं इस कविता कि भूमिका में बस इतना ही कहना चाहूंगा के आज हमारे देश में देह व्यापार अपनी जड़े जमा चुका है और लगातार फल फुल रहा है, जबकि हमारे देश में देह व्यापार करना या कराना एक जघन्य अपराध है और इसमें दोषी पाए जाने पर कड़ी सजा का प्रावधान है लेकिन फिर भी देह व्यापार और वेश्यावृत्ति दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ रही है |

     देह व्यापार और वेश्यावृत्ति के इस दलदल में रोज हजारों मासुम बच्चीयों और महिलाओं को झोंक दिया जाता है और कुछ महिलाओं और बच्चीयों को यह अपराध अपना पेट पालने के लिए भी करना पड़ता है, आज परिस्थिति ये है कि हमारे देश भारत के हर बड़े छोटे शहर में एक गली ऐसी है जो देह व्यापार और वेश्यावृत्ति के लिए बदनाम है और ताज्जुब तो ये है कि हमारे देश की केन्द्र हो या राज्य की सरकारों ने सब कुछ जानते हुए भी अपने आख और कान मुद रखे हैं | मैने कुछ दिनों पहले कही पढा था की आज केवल हमारे देश में तकरीबन दो करोड से ज्यादा देह व्यापार एवं वेश्यावृत्ति में लिप्त महिलाए एवं पुरुष हैं और अब तो यह अमानवीय कारोबार भारत से विदेशों तक में होने लगा है |

      इसे आखिर कब तक हमारा सभ्य समाज देख कर भी अनदेखा करता रहेगा और पुलिस अमला एवं सरकारें मूक दर्शक बनकर केवल तमाशा देखती रहेंगी | क्या अब जब देश नयी तरक्की की राह पर आगे बढ रहा है तो इन्हें इनके विकास का मौका नही मिलना चाहिए ? , क्या ये लोग देश की सरकार को चुनने में अपना फर्ज अदा नही करते क्या ? इनके भले के लिए कुछ और बेहतर प्रयासों, जागरुकता और कानूनों की जरुरत है |

मुजरालय

पायल की छन छन
चूड़ियों की खन खन
तबले की थप थप
घुंघरूओ की छनन छनन
नृत्य और संगीत का रस
काम का सिंगार का रस
या यूं कि कहो मदिरालय
या कहो मुजरालय

आम बस्ती से अलग बसी
वो मशहूर वो बदनाम गलियां
जानता है हर शरीफ शख्स पर
फिर भी है वो गुमनाम गलियां
न बिजली न पानी न सड़कें
ना ही कोई विद्यालय न शिवालय
जहां आबाद है ये मुजरालय

जीने का हक तो है इन्हें
पर जिंदगी तो कही है नहीं
सूरज रोज निकलता है यहां
धूप भी आती है आंगन में
पर रोशनी तो कही है नहीं
ललचा रही है एक तितली
हवस के भूखे भवरों को
जिसे उड़ना चाहिए फूलों पर
वो आ पहुंची है मुजरालय

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हास्य व्यंग कविता, उखाड़ लो घंटा

     नमस्कार, आपके लिए प्रस्तुत है मेरी तकरीबन दो महीने पहले लिखी एक हास्य व्यंग कविता जिसका शीर्षक है

उखाड़ लो घंटा

तुम कोशिश कर कर के मर जाओगे
ये देश नहीं बदलनेवाला
अपनी दकियानूसी सोच नहीं छोड़नेवाला
सब ने समझा समझा के खूब , गाड लिया झंडा
अब तुम भी , उखाड़ लो घंटा

हाथ पांव जोड़कर जो एक बार
विधायक , एमपी , मंत्री ये सब बन गया
वह पांच साल कुछ नहीं करेगा
खूब घोटाला और भ्रष्टाचार करेगा
अपने तिजोरी और जेब भरेगा
तुम्हारी नहीं सुनेगा
जो कर सकते हो कर लो , मार लो डंडा
अब तुम , उखाड़ लो घंटा

मजनू साहब बिक गए लैला को शैर कराने में
महंगे गिफ्ट दिलाने में
होटल पर पकवान खिलाने में
अब लैला किसी और मजनू संग फुर्र हो गई
और तुम पियो , पानी ठंडा
नहीं तो मजनू राजा , उखाड़ लो घंटा

काला धन वापस आएगा
महंगाई कम हो जाएगी
राशन सस्ता हो जाएगा
दाल सस्ती हो जाएगी
सब को रोजगार मिलेगा
पर जाने कब मिलेगा
और कुछ नहीं भी हो पाया तो
अपनी सरकार है , अपना है अंटा
और अब हमारा तुम , उखाड़ लो घंटा

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रविवार, 8 सितंबर 2019

मुक्तक, चार चार लाइनों में बातें करूंगा आपसे 12

     नमस्कार, पिछले एक महीने के दरमिया में लिखे गए अपने कुछ मुक्तक आपकी महफिल में रख रहा हूँ मुझे उम्मीद है कि आपको मेरे यह मुक्तक अच्छे लगेंगे

अब के तैयार हो के आया हूं नुमाइश में तेरी
देखना हैं कितनी आग है ख्वाइश में तेरी
देखना कोई आसान सा इंतहान न ले ले ना
मैं तो जान भी देने आया हूं आज़माइश में तेरी

तिरयात हर जहर का नही होता
एक मुसाफिर हर सफर का नही होता
कश्मीर हिंदुस्तान का हिस्सा ही नहीं मस्तक है
जीते जी धड कभी सर से अलग नही होता

ये खुदा की लाठी का असर लगता है
तुम्हार फैलाया हुआ ही जहर लगता है
ये जो उड़ी है तुम्हारे चेहरे की हवाईया
ये तो मेरी शख्सियत का असर लगता है

आ अब आशुओ से कहें अब ये बहेंगे नही
वो तो गैर हैं तुझसे सच्ची बात कहेंगे नही
आज हम दोनों तो लड़ते रहेंगे सरहदों के लिए
कल ये सरहदें रहेंगी हम दोनों तो रहेंगे नही


उसका यही बचकाना रवैया तो हैरान कर रहा है
जिसे जंग से बचना चाहिए वही ऐलान कर रहा है
खुद उसके घर में पीने के लिए पानी नही है
हमे समंदर दिखा दिखा के परेशान कर रहा है

इस तरह से कहा कोई कहानी मुकम्मल होती है
दो जिस्म मिलाकर एक जवानी मुकम्मल होती है
जब जरा जरा सी लहरे ज्यादा लहराती हैं
दो नदियों के संगम से एक रवानी मुकम्मल होती है

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