गुरुवार, 9 अगस्त 2018

कविता, यह खिड़की बंद ही नहीं होती

नमस्कार , ये जो कविता है इसके बारे में मै बस इतना कहना चाहूंगा के ये कविता नही अविधा है | ये कविता मैने करिबदन 22 नवम्बर 2016 को साम के वक्त लिखा था | मुझे आशा है कि मेरी यह कविता आप को पसंद आयेगी |

कविता, यह खिड़की बंद ही नहीं होती


यह खिड़की बंद ही नहीं होती

मेरे सिरहाने एक खिड़की है
जिसमें पर्दे भी नहीं है
एक तो जाड़े का मौसम है
सुबह शाम ठंडी ठंडी हवा आती है
सहर होते ही कहीं से टुकटुक की आवाज आती   है
और मेरी नींद भी पूरी नहीं होती
बस ओठकाकर सोता हूं इसे
बहुत कोशिश की मगर
यह खिड़की बंद ही नहीं होती  

रोज एक खुशबू आती है कहीं से
मेरे बिन चाहे कमरे मे फैल जाती है
पक्षियों का चहचहाना ,मंदिर के घंटों की आवाज
बस यूं ही सुनाई देती रहती  है
खिड़की के उस पार वाले रास्ते से
रोज एक चेहरा गुजरता है
जिसे देखने के खातिर मेरा दिल मचलता है
यह ख्वाहिशें मुझे मेरे लक्ष्य से भटका जाती है
बहुत कोशिश की मगर
यह खिड़की बंद ही नहीं होती 

     मेरी गजल के रूप में एक और छोटी सी यह कोशिस आपको कैसी लगी है मुझे अपने कमेंट के जरिए जरुर बताइएगा | अगर अपनी रचना को प्रदर्शित करने में मुझसे शब्दों में कोई त्रुटि हो गई हो तो तहे दिल से माफी चाहूंगा |  एक नई रचना के साथ मैं जल्द ही आपसे रूबरू होऊंगा | तब तक के लिए अपना ख्याल रखें  अपने चाहने वालों का ख्याल रखें | मेरी इस रचना को पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया | नमस्कार |

ग़ज़ल, वक्त के हिसाब से लोग बदल जाते हैं

नमस्कार , वक्त के हिसाब से लोग बदल जाते हैं ये गजल 5 अक्टूबर 2016 की है | इस गजल को लिखने के पीछे मेरे दिल का एक मामला है कभी गर मैका मिला तो आप को जरूर बताऊंगा | मगर फिर हाल इस गजल का मजा लिजीये |

ग़ज़ल, वक्त के हिसाब से लोग बदल जाते हैं


कभी गिरते हैं तो कभी संभल जाते हैं
वक्त के हिसाब से लोग बदल जाते हैं

एक पल की जुदाई भी बर्दाश्त नहीं होती उन्हें
सितारे भी रात के साथ ढल जाते हैं

क्या हुआ घर गमो का साया बना रहता है
ओस की चंद बूंदों से फूल खिल जाते हैं

सच का सही होना अब कहां जरूरी है
आजकल तो नकली नोट भी बाजार में चल जाते हैं

किसी की शख्सियत का अंदाजा लगाना अब जरा मुश्किल है
पलों में लोगों के खयालात बदल जाते हैं

उन लम्हों को बड़ी फुर्सत से जीना
हसीन पल बड़ी जल्दी गुजर जाते हैं

     मेरी गजल के रूप में एक और छोटी सी यह कोशिस आपको कैसी लगी है मुझे अपने कमेंट के जरिए जरुर बताइएगा | अगर अपनी रचना को प्रदर्शित करने में मुझसे शब्दों में कोई त्रुटि हो गई हो तो तहे दिल से माफी चाहूंगा |  एक नई रचना के साथ मैं जल्द ही आपसे रूबरू होऊंगा | तब तक के लिए अपना ख्याल रखें  अपने चाहने वालों का ख्याल रखें | मेरी इस रचना को पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया | नमस्कार |

ग़ज़ल, शराब पीने से गम नहीं मिटता

नमस्कार , शराब पीने से गम नहीं मिटता यह पीने का एक बहाना है | ये गजल अखबार में प्रकाशित एक खबर पर मन की उपज है | इस रचना को मैने 1 फरवरी 2017 को लिखा था | गजल छोटी है पर गजल को लिखने का मक़सद बहुत बड़ा है |

ग़ज़ल, शराब पीने से गम नहीं मिटता

ये वह सच है जिसे जानता जमाना है
शराब पीने से गम नहीं मिटता ये पीने का एक बहाना है

अब क्या बाकी है मेरी जिंदगी में तुझसे बिछड़ कर
तन्हाइयों का साया है मौसमो का आना जाना है

वो दौर और था जब हम कभी गुनगुनाते थे
बड़ी मुद्दत हो गई अब ये किस्सा बहुत पुराना है

मेरा हश्र क्या हुआ इश्क में किसी से बेरूखी से पूछो
जिंदगी कब की जल गई बाकी अब बस घर जलाना है 

     मेरी गजल के रूप में एक और छोटी सी यह कोशिस आपको कैसी लगी है मुझे अपने कमेंट के जरिए जरुर बताइएगा | अगर अपनी रचना को प्रदर्शित करने में मुझसे शब्दों में कोई त्रुटि हो गई हो तो तहे दिल से माफी चाहूंगा |  एक नई रचना के साथ मैं जल्द ही आपसे रूबरू होऊंगा | तब तक के लिए अपना ख्याल रखें  अपने चाहने वालों का ख्याल रखें | मेरी इस रचना को पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया | नमस्कार |

ग़ज़ल, सुबह को आने दो

नमस्कार , 2 फरवरी 2017 की सुबह उगते सूरज को देखकर मैने एक गजल लिखी थी | आज फुर्सत के कुछ पल हासिल होने पर अपनी सभी पुरानी रचनाओं को आपके साथ साझा कर रहा हूं जिन्हें मैने बीते दो सालों के मध्य में लिखा है | गजल का आनंद उठाईये

ग़ज़ल, सुबह को आने दो

अंधेरों को डराऊंगा मैं , सुबह को आने दो
ये चिराग बुझाऊंगा मैं , सुबह को आने दो

तुम्हारी तस्वीर धुंधली सी नजर आ रही है अभी
जी भर कर देखूंगा तुम्हें , सुबह को आने दो

कल रात जुगनूओं से रास्ता पूछा तो बड़ा इतरा रहे थे ये
मैं सही रास्ता दिखाऊंगा इन्हें , सुबह को आने दो

रात में चंद खोखली दीवाने बना कर कहते हैं कि हमने महल बना दिया
दरारें कहां-कहां हैं सबको बताऊंगा मै , सुबह को आने दो

रात को ईमानों कि सौदायगी होती है
सियासत का हाल सुनाऊंगा तुम्हें , सुबह को आने दो

मेरे मन का आशियाना बड़ा सुनसान और अंधेरों भरा है
खुद से मिलाऊंगा तुम्हें , सुबह को आने दो

मैं ' तनहा ' बैठा रहा चांदनी को घेर रखा था इन्होंने
तारों की शिकायत करूंगा मैं , सुबह को आने दो

     मेरी गजल के रूप में एक और छोटी सी यह कोशिस आपको कैसी लगी है मुझे अपने कमेंट के जरिए जरुर बताइएगा | अगर अपनी रचना को प्रदर्शित करने में मुझसे शब्दों में कोई त्रुटि हो गई हो तो तहे दिल से माफी चाहूंगा |  एक नई रचना के साथ मैं जल्द ही आपसे रूबरू होऊंगा | तब तक के लिए अपना ख्याल रखें  अपने चाहने वालों का ख्याल रखें | मेरी इस रचना को पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया | नमस्कार |

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