शनिवार, 4 अगस्त 2018

चौपाई , जल प्रलय

    नमस्कार ,  चौपाई एक सम मात्रिक छंद है | चौपाई में लगभग 26 मात्राएं होती हैं तथा हर पंक्ति के अंत में एक लघु गुरु होता है | तुलसीदास द्वारा रचित हनुमान चालीसा चौपाई की सबसे लोकप्रिय रचना है , जो तकरीबन हर भारतीय को कंठस्थ है |  हनुमान चालीसा 40 चौपाइयों का एक समूह है | हनुमान चालीसा की तरह ही दुर्गा चालीसा भी होता है |

     आज यानी 04 अगस्त 2018 को मैंने चौपाई छंद में एक रचना करने की शुन्यमात्र कोशिश की है | अपनी इस छोटी सी कोशिश को मैं पूरे साहस से  आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं -

चौपाई , जल प्रलय

जल प्रलय

जल से तरबतर भारत की धारा
जहां तक नेत्र जाए जल हि भरा

जल प्रलय कैसे ये आया
प्राणों पर भी संकट ले आया

क्या शिव की यही माया है
जल ही जल सावन लाया है

जल से विनाश की कहानी हुई है
सैकड़ों ब्रांड हानि हुई

हे नियति और काल के गाल मत बजाओ
हे इंद्रदेव और चल मत बरसातओ

       मेरी चौपाई के रूप में एक और छोटी सी यह कोशिस आपको कैसी लगी है मुझे अपने कमेंट के जरिए जरुर बताइएगा | अगर अपनी रचना को प्रदर्शित करने में मुझसे शब्दों में कोई त्रुटि हो गई हो तो तहे दिल से माफी चाहूंगा |  एक नई रचना के साथ मैं जल्द ही आपसे रूबरू होऊंगा | तब तक के लिए अपना ख्याल रखें  अपने चाहने वालों का ख्याल रखें | मेरी इस रचना को पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया | नमस्कार |

हरि की कृण्डलियां

नमस्कार , यह कृण्डलियां मैने 29 जुलाई 2018 को लिखी थी | आज मै इन्हें आप समक्ष रख रहा हूं |मुझे आशा है कि मेरी ये रचनाए आप को अच्छी लगेंगी -

कृण्डलियां


हरि की कृण्डलियां

                            (1)

कर्मरत मन हो , लक्ष्य तय हो तुम्हारा
तैरना जिसे आता है , मिल जाता है उसे किनारा
मिल जाता है उसे किनारा ,  जो धार से लड़ते हैं
समय की धारा पर ,  नाम अपना लिखते हैं
कहे कवि हरि ,  फल पाते हैं वो
फल पाने की चाह छोड़ , कर्म को धर्म बनाते हैं जो

                            (2)

पानी सिर बादल बने , बने बादल से पानी
सब पहले से निर्धारित है , नियति केहू न जानी
नियति केहू न जानी ,  तब काहे की सोच
कल की चिंता छोड़ दे , बस आज की तू सोच
कहत कवि हरि , अज्ञान है मनुष्य
वर्तमान खो देता है , सोचने में भविष्य

       मेरी कृण्डलियां के रूप में एक और छोटी सी यह कोशिस आपको कैसी लगी है मुझे अपने कमेंट के जरिए जरुर बताइएगा | अगर अपनी रचना को प्रदर्शित करने में मुझसे शब्दों में कोई त्रुटि हो गई हो तो तहे दिल से माफी चाहूंगा |  एक नई रचना के साथ मैं जल्द ही आपसे रूबरू होऊंगा | तब तक के लिए अपना ख्याल रखें  अपने चाहने वालों का ख्याल रखें | मेरी इस रचना को पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया | नमस्कार |

क़व्वाली, ये जो मोहब्बत है

नमस्कार , मैने ये क़व्वाली 29 जूलाई 2018 को लिखा था जिसे मैं आज आपके समक्ष सर्वप्रथम प्रस्तुत कर रहा हूं | मुझे उम्मीद है के मेरी इस रचना को भी आप पहले प्रकाशित रचनाओं की तरह ही प्यार देंगे -

क़व्वाली, ये जो मोहब्बत है

लाइलाज बीमारी है दिल का मर्ज है
ये जो मोहब्बत है मेरी जॉ का दर्द है

मैंने सोचा था कि मोहब्बत के दम पर महबूबा खरीदै लूंगा में
मेरी हैसियत से कहीं ज्यादा निकला वो
खुदा जाने  क्या लेकर आई है आज कि ये सब
माहौल है गरम मौसम ये सर्द है
ये जो मोहब्बत है ......

कोई पूछे ना रोने का सबब उसके
इसलिए वो सबसे नजरें चुरा कर रोता है
एक तरफा मोहब्बत में यह जो हाल हुआ है
जमाने की रावायत है मोहब्बत का कर्ज है
ये जो मोहब्बत है ......

मुसलसल कई दिनों से उन्हें एक गुलाब देता हूं
पत्थरों पर लकीरें बना रहा हूं
तय है के नही आयेगी मेरे हाथ चॉदनी
महताब देखने में मगर क्या हर्ज है
ये जो मोहब्बत है ......

लाइलाज बीमारी है दिल का मर्ज है
ये जो मोहब्बत है मेरी जॉ का दर्द है

       मेरी क़व्वाली के रूप में एक और छोटी सी यह कोशिस आपको कैसी लगी है मुझे अपने कमेंट के जरिए जरुर बताइएगा | अगर अपनी रचना को प्रदर्शित करने में मुझसे शब्दों में कोई त्रुटि हो गई हो तो तहे दिल से माफी चाहूंगा |  एक नई रचना के साथ मैं जल्द ही आपसे रूबरू होऊंगा | तब तक के लिए अपना ख्याल रखें  अपने चाहने वालों का ख्याल रखें | मेरी इस रचना को पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया | नमस्कार |

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

हजल, ज्यादा दिन थोड़ी हुए

   नमस्कार ,  हजल गजल का ही हास्यात्मक स्वरुप है |  कल सुबह एक हजल न्यू हुई के

हजल, ज्यादा दिन थोड़ी हुए


उस हसीना से आंख मिलाओ , ज्यादा दिन थोड़ी हुए
उसके भाइयों से मार खाए , ज्यादा दिन थोड़ी हूए

मेरी महबूबा बहुत कम खर्चीली है
उसे तीन लाख का शौपिंग कराएं , ज्यादा दिन थोड़ी हुए

नेताजी वापस आते ही चुनाव की तैयारियों में लग गए
तिहाड़ जेल से छुटकार आए , ज्यादा दिन थोड़ी हुए

एक बहुत बड़ा बिजनेसमैन मुझसे बस एक बार मिलना चाहता है
मुझे उसका पर्श चुराए , ज्यादा दिन थोड़ी हूए

दुनिया को शुन्य मैं ने दिया है
अभी मुझे आगरा से भागकर आए , ज्यादा दिन थोड़ी हुए

       मेरी हजल के रूप में एक और छोटी सी यह कोशिस आपको कैसी लगी है मुझे अपने कमेंट के जरिए जरुर बताइएगा | अगर अपनी रचना को प्रदर्शित करने में मुझसे शब्दों में कोई त्रुटि हो गई हो तो तहे दिल से माफी चाहूंगा |  एक नई रचना के साथ मैं जल्द ही आपसे रूबरू होऊंगा | तब तक के लिए अपना ख्याल रखें  अपने चाहने वालों का ख्याल रखें | मेरी इस रचना को पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया | नमस्कार |

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