गुरुवार, 14 जून 2018

कजरी या सावन महीने का लोकगीत , पकड़के रेलगाड़ी

नमस्कार ,  कजरी या सावन महीने का लोकगीत एक तरह की लोकगीत है जोकि सावन के महीने में गायी जाती है | कजरी लोकगीत मुख्यतः मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ , बिहार आदि राज्यों में गायी जाती है | सावन का महीना हरियाली से भरा होता है और यही इस लोकगीत की आत्मा होता है |

    तकरीबन 2 हफ्ते पहले मैंने भी एक कजरी लोक गीत की रचना की है जिसे मैं आपके सम्मुख हाजिर कर रहा हूं आपके दुलार की उम्मीद है -

पटना के बिंदिया
बनारस के साड़ी
लेकर आब  सईयां
पकड़के रेलगाड़ी

कजरी या सावन महीने का लोकगीत , पकड़के रेलगाड़ी

सावन के महीना
कठिन होता जीना
चम चम चमके बिजली
पानी बरसे रोजीना
कईसे समझाई तोहरे की
पिया समझा लाचारी
हाली आब सईयां
पकड़के रेलगाड़ी

बरसात की टिप - टिप
दीया जले धिप - धिप
जिया हमार धडके
धक - धक , धिक - धिक
आजाना जल्दी
तड़पे तोहार प्यारी
आबन सईयां
पकड़के रेलगाड़ी

पटना के बिंदिया
बनारस के साड़ी
लेकर आब  सईयां
पकड़के रेलगाड़ी

    मेरी ये कजरी या सावन महीने का लोकगीत आपको कैसी लगी मुझे अपने कमेंट्स के जरिए जरूर बताइएगा | अगर अपने विचार को बयां करते वक्त मुझसे शब्दों में कोई गलती हो गई हो तो उसके लिए मैं तहे दिल से माफी चाहूंगा | मैं जल्द ही वापस आऊंगा एक नए विचार नयी रचनाओं के साथ | तब तक अपना ख्याल रखें, अपनों का ख्याल रखें ,नमस्कार |  

मंडप छपाई का एक लोकगीत

   नमस्कार ,  विवाह एक ऐसा रिश्ता है जो दो इंसानों ( लड़का एवं लड़की ) को जीवन भर के लिए एक अटूट बंधन में बांध देता है | विवाह के इस पावन मौके पर हमारे देश के कुछ राज्यों जैसे - मध्य प्रदेश , उत्तर प्रदेश , बिहार , झारखंड एवं राजस्थान आदि में  कुछ लोक गीत गाए जाते हैं जिन्हें विवाह लोकगीत कहा जाता है |

     आज मैं आपको विवाह के वक्त गाए जाने वाले लोकगीतों में से मंडप छपाई के वक्त गाए जाने वाले एक लोकगीत को प्रस्तुत कर रहा हूं | इस लोकगीत को मैंने 22 जून 2018 को लिखा था | मुझे आशा है मेरा यह लोकगीत आपको जरूर पसंद आएगा -

मंडप छपाई का एक लोकगीत

कहां से लिअईल फूफा बांस के भथुनिया हो
कहां से लिअईल कल्याणी
अयोध्या से लिअईली बेटा बांस के भथुनिया हो
अयोध्या से लिअईली कल्याणी

का चाही फूफा तोहरे की मडवा छबउनी हो
कहां चाही गड़बऊनी कल्याणी
चांदी चाहि बेटा हमके मडवा छबउनी हो
सोना चाहि गड़बऊनी कल्याणी

चांदी बा महंगा फूफा सोना बा महंगा हो
कइसे हम तोहर नेगबा चुकाई
कुछ नहीं चाहि बेटा हमके मडवा छबउनी हो
कुछ नहीं चाहि गड़बऊनी़ कल्याणी

    मेरी ये मडवा छवाई की विवाह लोकगीत आपको कैसी लगी मुझे अपने कमेंट्स के जरिए जरूर बताइएगा | अगर अपने विचार को बयां करते वक्त मुझसे शब्दों में कोई गलती हो गई हो तो उसके लिए मैं तहे दिल से माफी चाहूंगा | मैं जल्द ही वापस आऊंगा एक नए विचार नयी रचनाओं के साथ | तब तक अपना ख्याल रखें, अपनों का ख्याल रखें ,नमस्कार |  

शुक्रवार, 8 जून 2018

फगुआ लोकगीत , भऊजी हो

    नमस्कार ,  होली हमारे देश भारत के कुछ प्रमुख त्योहारों में से एक है |  होली रंगों का सबसे बड़ा पर्व है जिसमें लोग एक दूसरे को गुलाल लगाते हैं एवं शुभकामनाएं देते हैं |  होली के त्यौहार में कहा जाता है कि दुश्मन भी एक दूसरे के गले लगते हैं एवं गुलाल लगाते हैं |  होली का पर्व उमंग उत्साह एवं  आपसी भाईचारे का पर्व है | होली के पर्व में जीजा साली एवं देवर भाभी के तीखे मीठे रिश्ते की नोकझोंक भी देखने को मिलती है |
होली के त्यौहार में एक लोक गीत भी गायी जाती है जिसे फगुनिया या फगुआ कहते हैं |

फगुआ लोकगीत में देवर भाभी , जीजा साली एवं पति पत्नी के रिश्ते की  झलक देखने को मिलती है |  फगुआ लोकगीत भारत के मध्य प्रदेश , उत्तर प्रदेश , बिहार आदि हिंदी भाषी राज्यों में गायी जाती है| | देवर भाभी के नोक झोंक के रिश्ते पर आधारित 23 मई 2018 को मैंने भी एक फगुआ लोक गीत की रचना की है | जिसे मैं आपके मनोरंजन के लिए आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं -

फगुआ लोकगीत , भऊजी हो

अब के फागुन में
भईया नहीं अइहीं हो , भऊजी हो
कैइसे होली के माजा
उठईबु हो , भऊजी हो

केकरेे से होली में रंग डलबईबु
केकरे से गाले अबीर मलबईबु
पुआ कचोरी अब कइसे छनाई
केकरे से रंगे में चोली भीगबईबु हो , भऊजी हो
कैइसे होली के माजा
उठईबु हो , भऊजी हो

छोटका देवरवा से रंग डलवा ल
हमरे से गाले अबीर हमबा ल
छेना के खाल तू लमहर मलाई
अब होली में का तू जईबु हो , भऊजी हो
कैइसे होली के माजा
उठईबु हो , भऊजी हो

अब के फागुन में
भईया नहीं अइहीं हो , भऊजी हो
कैइसे होली के माजा
उठईबु हो , भऊजी हो

      मेरी ये फगुआ लोकगीत आपको कैसी लगी मुझे अपने कमेंट्स के जरिए जरूर बताइएगा | अगर अपने विचार को बयां करते वक्त मुझसे शब्दों में कोई गलती हो गई हो तो उसके लिए मैं तहे दिल से माफी चाहूंगा | मैं जल्द ही वापस आऊंगा एक नए विचार नयी रचनाओं के साथ | तब तक अपना ख्याल रखें, अपनों का ख्याल रखें ,नमस्कार |  

प्रभाती लोकगीत , अब तुम भी जागो नंदलाला

    नमस्कार ,  प्रभाती भी एक लोकगीत है | इसे मां अपने बच्चे को सुबह के समय जगाने के लिए गाती हैं | प्रभाती लोक गीत भी भारत के कई हिस्सों में गायी जाती है जैसे मध्य प्रदेश , उत्तर प्रदेश , बिहार , राजस्थान आदि | प्रभाती में भी लोरी के तरह ही  वात्सल्य रस का समावेश होता है | प्रभाती लोक गीतों में  माता यशोदा द्वारा भगवान श्रीकृष्ण को सुबह के समय जगाने के दृश्य का गीतों में अनुसरण मिलता है |

    22 मई 2018 को ही मैंने एक प्रभाती भी लिखी थी जिसे मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं , मेरे प्रयासो को आपके आशीर्वाद की उम्मीद है -

प्रभाती लोकगीत , अब तुम भी जागो नंदलाला

कलियां जागी , फूल जागे
तितलियां जागी , पत्ते जागे
जागे सारे ग्वाला
सारी दुनिया जाग गई
अब तुम भी जागो नंदलाला

कहीं गेंद खेलो
कहीं माखन खाओ
कहीं मटकी फोडो
दिखाओ कोई खेल निराला
सारी दुनिया जाग गई
अब तुम भी जागो नंदलाला

मैं अब ना तुम्हें जगाउंगी
अपना प्रभाती जाऊंगी
अभी मंदिर भी सजाना है
बनानी है फूलों की माला
सारी दुनिया जाग गई
अब तुम भी जागो नंदलाला

      मेरी ये प्रभाती लोकगीत आपको कैसी लगी मुझे अपने कमेंट्स के जरिए जरूर बताइएगा | अगर अपने विचार को बयां करते वक्त मुझसे शब्दों में कोई गलती हो गई हो तो उसके लिए मैं तहे दिल से माफी चाहूंगा | मैं जल्द ही वापस आऊंगा एक नए विचार नयी रचनाओं के साथ | तब तक अपना ख्याल रखें, अपनों का ख्याल रखें ,नमस्कार |  

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