रविवार, 4 जनवरी 2026

कविता, थलपरी

माथे पर सिन्दूर 

और सिकर 

मिश्रित ही बहता है 

सुर्य की तपती 

किरणों से झुलसती है देह 

बार-बार उठाती है घमेला 

खोंसकर पल्लू साड़ी का 

और इतराती भी है खुद पर वो 

जैसे वो समझती है 

खुद को कोई परी 

पर मैं तो कहुंगा 

उसे थलपरी 


परीयों की सुन्दरता तो 

मनगढ़ंत है 

किसी अती सौन्दर्यवादी का प्रपंच है 

पर मैं ने जिसे देखा है 

आलू के खेत में 

कुदाल चलाते हुए 

मेहंदी लगे हाथों से 

उसकी बराबरी क्या करेगी 

कोई जलपरी 

पर मैं तो कहुंगा 

उसे थलपरी

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